बुधवार, 23 मई 2007

क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं?

अगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी की घडियों को किन-किन से आबाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

याद सुखों की आसूं लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूं जब अपने से, अपने दिन बर्बाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

दोनो करके पछताता हूं,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूं,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आबाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

-हरिवंशराय बच्चन

2 टिप्पणियाँ:

Divine India ने कहा…

बेहद सुंदर कविता और सार्थक भी जो हृदय की व्यथा को सरलता से कह दिया…।बधाई!!

manya ने कहा…

बच्चन साहब की कवितायें बेहद पसंद है मुझे .. इसे यहाम प्रेषित करने का शुक्रिया.. कैसी है.. ये कहने की जरूरत नहीं..