शनिवार, 26 मई 2007

गहन है यह अंधकारा

गहन है यह अंधकारा;
स्वार्थ के अवगुंठनों से
हुआ है लुंठन हमारा।

खड़ी है दीवार जड़ की घेरकर,
बोलते है लोग ज्यों मुँह फेरकर
इस गगन में नहीं दिनकर;
नही शशधर, नही तारा।

कल्पना का ही अपार समुद्र यह,
गरजता है घेरकर तनु, रुद्र यह,
कुछ नही आता समझ में
कहाँ है श्यामल किनारा।

प्रिय मुझे वह चेतना दो देह की,
याद जिससे रहे वंचित गेह की,
खोजता फिरता न पाता हुआ,
मेरा हृदय हारा।


-सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

2 टिप्पणियाँ:

परमजीत बाली ने कहा…

निराला जी की रचना पढ कर बहुत अच्छा लगा।उन की रचना यहाँ देने के लिए धन्यवाद।

Divine India ने कहा…

निराला जी को प्रस्तुत कर आपने आभार किया है…।धन्यवाद!!