सोमवार, 23 अप्रैल 2007

पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,

चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ,

चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ।

मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पर जावें वीर अनेक ।

-माखनलाल चतुर्वेदी

2 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छा संकलन ला रहे हैं, साधूवाद.

yunus ने कहा…

अभिनव
पुष्‍प की अभिलाषा वाली ये कविता मैंने बचपन में म0प्र0 में बालभारती में पढ़ी थी ।
कहने का मतलब ये कि कविता हमारे कोर्स में थी । आजकल मैं खुद इन कविताओं को खोज खोज कर पढ़ रहा हूं । कुछ दिन पहले कहीं से ‘यह कदंब का पेड़’ वाली कविता मेरे छोटे भाई ने खोजकर भेजी थी । विविध भारती में हाल ही में मुझे भवानी प्रसाद मिश्र की आवाज़ में उनकी कविताएं मिलीं । जिनमें ‘सतपुड़ा के घने जंगल’, ‘सन्‍नाटा’ और ‘गीतफरोश’ शामिल हैं । मैंने रविवार शाम चार बजे प्रसारित होने वाले अपने कार्यक्रम यूथ एक्‍सप्रेस में फौरन उन्‍हें प्रसारित कर दिया । आप कविताप्रेमी हैं । यूथ एक्‍सप्रेस सुनिए । इसमें हम हर सप्‍ताह किसी महान, महत्‍त्‍वपूर्ण कवि या शायर के स्‍वर में उसकी कविताएं प्रसारित कर रहे हैं । ये उस कार्यक्रम का एक छोटा सा स्‍तंभ है, आज ही आपका चिट्ठा देखा और आपका प्रयास अच्‍छा लगा तो सोचा कि बधाई तो दे ही दूं । अंत में गोपाल सिंह नेपाली की कविता की पंक्तियां, ये भी बचपन में कोर्स में पढ़ी थी । घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो आज द्वार द्वार पर ये दिया बुझे नहीं । ये निशीथ का दिया जा रहा विहान है
ये दिया बुझे नहीं
ये दिया बुझे नहीं । एक बात और नेपाली जी की बेटी कमला कुंदर विविध भारती में हमारी सहकर्मी हैं । इस संस्‍था में आकर जब उनसे परिचय हुआ तो काफी अच्‍छा लगा ।