बृहस्पतिवार, 1 मार्च 2007

आह को चाहिये

आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ के सर होने तक

आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंज करूं खूने जिगर होने तक

हमने माना कि तगाफुल ना करोगे लेकिन,
ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक

परतव-ए-खुर से है शबनम को फना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत कि नज़र होने तक

गम-ए-हस्ती का असद किससे हो जुज़ मर्ग इलाज
शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक

-मिर्ज़ा गालिब

1 टिप्पणियाँ:

priyankar ने कहा…

गालिब बहुत बड़े लेखक हैं. १८५७ की १५० वीं वर्षगांठ मनाते समय उस दौर को समझने के लिए गालिब के साहित्य को पुनः पढ़ा जाना बहुत ज़रूरी है.